हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल के सीमा निर्धारण को लेकर विवाद रहा है। कोई संवत् 1050 से इसकी शुरूआत मानता है तो कोई 693 ई॰ से। हिंदी भाषा के प्रस्थान वर्ष एवं अंतिम सीमा को लेकर भी विद्वानों में मतैक्यता नहीं रही है। यही कारण है कि इस प्रारंभिक काल के नाम को लेकर भी मतैक्य नहीं दिखता।
हिंदी साहित्य के प्रथम इतिहासकार ‘गार्सा-द-त्तासी’ के इतिहास में इस प्रकार के साहित्यिक कालखंड का कोई विभाजन नहीं है। इसी प्रकार ठाकुर शिव सिंह सेंगर के ‘‘शिव सिंह सरोज’’ में किसी निश्चित दृष्टिकोण के अभाव में काल विभाजन ठीक से नहीं किया गया है।
जॉर्ज ग्रियर्सन शायद हिंदी साहित्य के पहले इतिहासकार हैं जिन्होंने काल विभाजन और नामकरण की परंपरा की शुरूआत की। जॉर्ज ग्रियर्सन ने ऐतिहासक प्रक्रिया के तहत् इस काल का नामकरण चारण काल किया। लेकिन वे विभाजन और नामकरण के बीच तालमेल नहीं बिठा पाते। साथ ही हम 643 ई॰ में चारणों की प्रवृत्ति को उस प्रकार से उभरते हुए नहीं पाते हैं। चूकि उरोक्त दोष के साथ यह अन्य प्रवृत्तियों को भी स्पष्ट नहीं करती है अतः यह नाम अनुचित लगता है। दूसरे महत्वपूर्ण इतिहसकार मिश्रबंधू हैं। उन्होंने आदिकाल का नाम प्रारंभिक काल रखा था। यह एक सामान्य सा नाम है। उन्होंने नाम की प्रस्तावना के पीछे कोई तर्क नहीं रखा। इस नाम से उस काल के मुख्य मनोभाव और अभिरूची का भी पता नहीं चलता है। अतः इस नाम को एक सामान्य नाम ही मानना चाहिए।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल काल क्रम के आधार पर इस काल को आदिकाल और प्रवृत्ति के आधार पर वीरगाथा काल नाम देते है। शुक्ल जी ने नामकरण के लिए दो आधार अपनाए हैं- कालक्रम का आधार और काल विशेष में प्रवृत्ति विशेष की प्रधानता का आधार। शुक्ल जी ने प्रवृत्ति के निर्धारण के लिए भी कसौटियाँ निर्धारित की है। पहली कसौटी है विशेष प्रकार की रचनाओं की प्रचुरता और दूसरी कसौटी है विशेष प्रकार की रचनाओं की प्रसिद्धि।
शुक्ल जी ने बारह ग्रंथों के आधार पर आदिकाल का नामकरण किया है। जो निम्न है-
1 विजयपाल रासो
2 खुम्माण रासो
3 बीसलदेव रासो
4 पृथ्वीराज रासो
5 जयचंद प्रकाश
6 जयमयंक जस चंद्रिका
7 हम्मीररासो
8 परमाल रासो
9 विद्यापति की पदावली
10 कीर्तिलता
11 कीर्तिपताका
12 अमीर खुसरो की मुकरियाँ/पहेलियाँ
शुक्ल जी की राय में इन 12 पुस्तकों में विद्यापति की पदावली, अमीर खुसरों की पहेलियाँ और बीसलदेव रासो को छोरकर शेष नौ पुस्तकें वीरगाथात्मक हैं। अतः शुक्ल जी ने 12 रचनाओं में 9 की बहुसंख्या के आधार पर ही इस काल को वीरगाथा काल नाम दिया है।
शुक्ल जी ने वीरगाथा काल नाम के पक्ष में तत्कालीन राजनैतिक सामाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन को भी एक ठोस आधार के रूप में रखा है। वे कहते हैं कि सम्वत् 1050 से 1375 तक अर्थात् महाराजा भोज से लेकर हम्मीर देव के समय के कुछ पीछे तक के काल को हिंदी साहित्य का आदिकाल माना जा सकता है। आदिकाल की इस दृढ परम्परा के बीच प्रथम 150 वर्ष के भीतर रचना की किसी विशेष प्रवृत्ति का निश्चय नहीं होता है- धर्म, नीति, श्रृंगार, वीर सब प्रकार की रचनाएँ दोहो में मिलती है। इसके बाद जब मुसलमानों का आक्रमण प्रारंभ हुआ तब से हिंदी साहित्य एक विशेष प्रवृत्ति में बंधता मिलता है।
शुक्ल जी ने जिन पुस्तकों के आधार पर इस काल को वीरगाथा काल कहा है, उनमें से कुछ महज सूचनात्मक है और अधिकांश अप्रमाणिक। कुछ में तो रचना काल के बाहर की भी घटनाएँ मिलती है। हम्मीर रासो के आठ छन्द मिलते हैं। साथ ही शुक्ल जी इसे सारंगधर रचित मानते है तो अन्य जज्जल कृत। विजयपाल रासो तोप के वर्णन के कारण 16वीं शताब्दी की रचना ठहरती है। खुम्माण रासो का कवि अपने का खुम्माण का समकालीन बताता है, साथ ही 17वीं शताब्दी के राजा जय सिंह का वर्णन भी करता है। इस काल का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ पृथ्वीराज रासो सबसे विवादित है। दूसरी बात कि परमाल रासो और बीसलदेव रासो गेय काव्य होने के कारण अपनी मूल से काफी विलग हो गया है। कीर्त्तिपताका नाम की पुस्तक अभी उपलब्ध नहीं है तथा जयचन्द प्रकाश और जयमयंक जस चंद्रिका का राजस्थान के इतिहास ग्रंथ में उल्लेख भर है। ऐसी सूचनात्मक और अप्रमाणिक सामग्रियों के आधार पर इस काल की प्रवृत्ति का निर्धारण कठिन है। शुक्ल जी ने नामकरण के पक्ष में जो तर्क दिए हैं वे ठोस एवं वैज्ञानिक है लेकिन वे बहुत कमजोर तथ्य पर आधारित हैं।
वीरगाथा काल नाम से धार्मिकता और श्रृंगार की प्रवृत्ति का पता नहीं चलता है। शुक्ल जी सिद्धो-नाथों की रचनाओं को अपभ्रंश की रचना होने के कारण साहित्य कोटि में नहीं रखते हैं, जबकि कीर्तिलता और कीर्तिपताका जो अवहट्ट की रचना है को हिन्दी की रचनाएं कह कर आदिकाल में सम्मिलित कर देते हैं सिर्फ इसलिए कि उसमें वीरगाथात्मकता है। साथ ही आश्रयदाताओं के शौर्य वर्णन के कारण यह जनता की चित्तवृत्तियों का सच्चा प्रतिबिम्ब भी नहीं माना जा सकता है। वीरगाथा नाम के अंतर्गत विद्यापति की पदावली और अमीर खुसरो की पहेलियाँ भी सम्मिलित नहीं हो पातीं हैं। लिहाजा, कह सकते हैं कि वीरगाथा नाम उपयुक्त नहीं है।
डॉ॰ रामकुमार वर्मा ने प्रथम काल का नाम ‘‘संधिकाल और चारण काल‘‘ रखा है। उनका नाम दो भागों में विभाजित है। इस प्रकार के नाम के पीछे चिंतन का जो आधार है वह दो भागों में टूटती दिखाई पड़ती है। यह चिंतन भाषा और संवेदना के दो स्तरों पर विभाजित है। इस नाम से चंदवरदायी और जगनिक जैसे कवियों के काव्य प्रतिभा पर शंका जाहिर होती है। अतः यह नाम उपयुक्त नहीं है साथ ही बहुत से साहित्यिक रचना इस नाम के दायरे में नहीं आते हैं।
राहुल सांकृत्यायन इस काल को सिद्ध सामन्त काल नाम देते हैं। उससे धार्मिकता तथा सामन्तों से जुड़ी हुई वीरता का लाक्षणिक संकेत मिलता है, लेकिन सीधे किसी प्रवृति का बोध नहीं होता है। नाथों, जैनों, विद्यापति की पदावली और अमीर खुसरो की पहेलियाँ इस नाम के दायरे में नहीं आ पाती हैं।
आदिकाल नाम के समर्थन में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कुछ नया तर्क देते हैं। उनके अनुसार इस काल में चार प्रकार की रचनाएँ मिलती है-1 सिद्धों-नाथों-जैनों की उपदेशमूलक रचनाएँ, 2 वीररस से अनुप्राणित चरित काव्य, 3 लौकिक रस से अनुप्राणित श्रृंगारिक रचनाएं एवं 4 फुटकल विविध विषयों की कविताएँ। द्विवेदी जी धार्मिकता, वीरगाथात्मकता और श्रृंगारिकता को इस काल की तीन प्रमुख प्रवृत्तियों के रूप में स्वीकार करते हैं, और मानते हैं कि इसमें कोई एक प्रमुख नहीं रहा है। आदिकाल नाम इसलिए उचित है कि इसमें सभी प्रवृत्तियाँ बिना मुख्य और गौण के भेद बोध के एक साथ रह सकती हैं। आदिकाल शब्द से हिन्दी साहित्य और भाषा के प्रारम्भ की सूचना मिलती है लेकिन इससे किसी प्रवृत्ति विशेष का संकेत नहीं मिलता है। इस लिहाज से इस नाम में निश्चय ही कुछ कमियाँ है।
इन नामों में सभी दृष्टियों से शुक्ल जी द्वारा दिया गया आदिकाल, हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा समर्थित आदिकाल नाम ही सर्वाधिक उपयुक्त है। यह नाम उच्चारण सहज है। लोगों की जुबान पर चढ़ चुका है। यह हिन्दी की पाठकों की पाठकीय चेतना का हिस्सा बन चुका है।
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